खरबूजे और देसी गोमूत्र से बने जैव कीटनाशक ‘थार जैविक 41 ईसी’ को मिला पेटेंट

खरबूजे और देसी गोमूत्र से बने जैव कीटनाशक ‘थार जैविक 41 ईसी’ को मिला पेटेंट – भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने पेटेंट अधिनियम 1970 के तहत कीट नियंत्रण के लिए जैव-कीटनाशक ‘थार जैविक 41 ईसी’ पेटेंट  दिया  है। थार जैविक 41 ईसी जैव-कीटनाशक सिट्रलस कॉलोसिंथस (Citrullus colocynthis) और देसी गोमूत्र से बनाया गया है। सिट्रलस कॉलोसिंथस को बिटर ऐपल के नाम से भी जाना जाता है।

आईसीएआर – केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान के निदेशक डॉ. डी के समादिया ने बताया कि यह उत्पाद शुष्क क्षेत्र के फलों और सब्जियों में कीट-पीड़कों को नियंत्रित करने के लिए बिल्कुल सुरक्षित और प्रभावी है। उन्होंने डॉ एस एम हलधर वैज्ञानिक (कीट विज्ञान) और उनकी टीम को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी।

संस्थान ने इस उत्पाद को 2019 में “थार जैविक 41 ईसी” नाम से जारी किया था और पेटेंट के लिए आवेदन किया था। यह जैव कीटनाशक मित्र कीटों  के लिए सुरक्षित होने के साथ हेलिकोवर्पा, आर्मीगेरा, स्पोडोप्टेरा लिटुरा, सफेद मक्खी और एफिड के खिलाफ प्रभावी है।

मनुष्यों के लिए सुरक्षित

पौधे पर फाइटो टॉक्सिसिटी के प्रभाव का डेटा भी दर्ज किया गया और पाया गया कि जैव कीटनाशक (थार जैविक 41 ईसी) की अनुशंसित खुराक की 10 गुना अधिक मात्रा लगाने पर पौधे पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया। यह भी देखा गया है कि थार जैविक 41 ईसी जैव कीटनाशकों के छिड़काव के 3 दिनों के बाद फलों और सब्जियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और यह लोगों के  खाने के लिए सुरक्षित होती है।शुष्क क्षेत्र में नई किस्मों की कृषि तकनीकों और पौध संरक्षण उपायों के विकास के कारण शुष्क बागवानी फसलों का क्षेत्र और उपज क्षमता कई गुना बढ़ गई है।

कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग

भारत में शुष्क बागवानी फसलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए कीट-पीड़क प्रमुख बाधाएँ हैं। अतीत में रासायनिक कीटनाशकों ने कीटों और बीमारियों के प्रबंधन और शुष्क बागवानी फसलों के उत्पादन में वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन तीन दशकों से अधिक समय से उनके अंधाधुंध उपयोग ने कई समस्याओं को जन्म दिया है जैसे कीटनाशकों का प्रतिरोध बढ़ता गया , मित्र कीट  भी ख़त्म होने लगे  और अन्य  द्वितीयक कीटों का प्रकोप शुरू हो गया ।

जैविक वानस्पतिक कीटनाशक धीमी गति से कार्य करने वाले फसल रक्षकों का एक महत्वपूर्ण समूह है जो आमतौर पर मनुष्यों के लिए सुरक्षित होते हैं और न्यूनतम अवशिष्ट प्रभाव के साथ होते हैं।

Source: Krishakjagat.org


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