पूर्व सैनिक की पॉली बेग में सब्जियां उगाने की अनूठी पहल

पूर्व सैनिक की पॉली बेग में सब्जियां उगाने की अनूठी पहल – खेती में आजकल नित नए प्रयोग सामने आ रहे हैं। पॉली बेग में सब्जियां उगाने की अनूठी पहल खरगोन जिले की सेगांव तहसील के ग्राम दसनावल के सीमा सुरक्षा बल के पूर्व सैनिक श्री शिवराम चौहान (58) ने की है। वे गत एक वर्ष से अपने बाड़े में पॉली बेग में सब्जियां उगा रहे हैं। जवाहर मॉडल नामक इस तकनीक के लिए उन्होंने जैविक खेती और जैविक प्रमाणीकरण के लिए जवाहरलाल कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर में 3 दिन का प्रशिक्षण भी लिया। इसकी शुरुआत 50 बैग से की गई थी, जो 500 बैग के लक्ष्य तक पहुँचने वाली है।

श्री शिवराम चौहान ने कृषक जगत को बताया कि उनकी बचपन से खेती में रूचि थी, इसलिए हायर सेकेंडरी कृषि विषय से उत्तीर्ण की। कला स्नातक होने के बाद 1985 में बीएसएफ में भर्ती हुए और 5 वर्ष देश की सुरक्षा में दिए। पश्चिम बंगाल में जब पदस्थ थे,तब 1990 में स्वास्थ्यगत कारणों से सेना से सेवानिवृत्ति ली। निवृत्ति पश्चात जीविकोपार्जन के लिए 3 एकड़ जमीन में खेती के अलावा मोटर वाइंडिंग का प्रशिक्षण लिया और सेगांव में सिंचाई की मोटरें भी सुधारीं। गत वर्ष मंथन सहारा ग्रामीण एवं समाज सेवा समिति, खरगोन के माध्यम से जवाहर मॉडल नामक तकनीक का जवाहरलाल कृषि विश्व विद्यालय,जबलपुर में तीन दिवसीय प्रशिक्षण लिया।

श्री चौहान ने बताया कि इस प्रशिक्षण के पश्चात 2022 से घर के बाड़े में ही जवाहर मॉडल से सीमेंट/ आटे की खाली पॉली बैग में जैविक तरीके से सब्जियां उगा रहे हैं। 300 बैग भरे जा चुके हैं। 200 बैग भरना बाकी है। इनमें बैंगन,पालक, टमाटर और हरा धनिया, पत्ता गोभी आदि सब्जियां लगाई गई हैं। टमाटर के फूल आने लगे हैं। डेढ़ माह में फसल आ जाएगी। इसमें समय भी कम लगता है। पौधे लगाने से पहले मिट्टी में गोबर खाद, गोमूत्र, गुड़, बेसन, धन जीवामृत मिलाया जाता है। इन्होंने प्रयोग के तौर पर एक बैग में एक से अधिक सब्जियां लगाई हैं, जैसे बैंगन के साथ पालक या हरा धनिया। जब तक बैंगन तैयार हों, उसके पहले पालक आ जाएगी। बैग में लगाए इन पौधों को हल्की सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे पानी की भी बचत हो जाती है। जगह भी कम लगती है। शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण इन सब्जियों के बेचने से इन्हें दो माह में 20 हजार का मुनाफा हुआ है। लागत कम आती है, क्योंकि बीज के अलावा सिर्फ थैलियों का ही खर्च आता है। गोबर खाद आदि स्वयं के पशुओं से मिल जाता है। श्री चौहान ने अपने यहाँ कम्पोस्ट खाद और केंचुआ खाद की इकाई भी लगा रखी है। प्रारम्भ में केंचुए खंडवा से खरीदे थे। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ रही है। खाद का उपयोग पहले खेत में करेंगे। केंचुओं की संख्या और खाद की मात्रा बढऩे पर केंचुए और खाद भी बेचेंगे। इससे अतिरिक्त आय होगी।

क्या है जवाहर मॉडल?

जवाहर मॉडल, दरअसल सीमांत किसानों के आर्थिक विकास के लिए खेती का एक नया तरीका है जिसे जवाहर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया है। इसमें फसलें या सब्जियां भूमि के स्थान पर ग्रो-बैग्स में अंकुरित कर उगाई जाती है। इस तकनीक में बंजर भूमि या भूमि के छोटे टुकड़े का भी उपयोग किया जा सकता है। इस मॉडल को कम खर्च, कम पानी और बिना उर्वरक के कम या सीमित स्थान में किया जा सकता है। इस मॉडल की ख़ास बात यह है कि भूमि पर लगाने की तुलना में बैग्स में लगाने में पकने में बहुत कम समय लगता है।

Source: www.krishakjagat.org


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