बर्ड फ्लू का आणविक रचना तंत्र, वायरस का क्रियाकलाप और उसका रोग विस्तार

मॉलिक्यूलर लेवल पर LAPI और HAPI में एक फर्क होता है, जिसे मोटे तौर पर ऐसे समझा जा सकता है कि इनफ्लुएंजा वायरस की बीमारी पैदा करने के लिए अपने H प्रोटीन को HA1 और HA2 मैं तोड़ना पड़ता है, यदि ऐसा नहीं हुआ तो बीमारी नहीं होगी यह H प्रोटीन पोल्ट्री की कोशिकाओं में मौजूद विभिन्न एंजाइमों से टूटता है|

जिस इनफ्लुएंजा के वायरस प्रोटीन में इन एंजाइम सेठ टूटने की क्षमता होती है, वह HPAI बन जाता है, या एंजाइम मुख्यतः सांस लेने के तंत्र की कोशिकाओं में मिलते हैं, इसीलिए सबसे पहले लक्षण जुखाम की दिखाई देते हैं|

इनफ्लुएंजा वायरस की खासियत यह होती है कि यह अपने चेहरे बदलता रहता है, इसीलिए किसी एक पशु या पक्षी में विचरण करने वाला वह दूसरे पशु या पक्षी में बहुत मुश्किल से जाता है| परंतु जब जाता है तो विनाश करता है| इनफ्लुएंजा का वायरस किसी में भी हो पर इसका स्रोत जंगली पक्षी ही होते हैं जिन से निकलकर यह फालतू मुर्गियों में आता है, और वहां से अन्य पशुओं में जाता है,

एक्सपर्ट वैज्ञानिक यह मानते हैं कि मनुष्य में होने वाले घातक स्वाइन फ्लू वायरस जंगली पक्षियों से निकलकर फालतू मुर्गियों मैं आए और फिर सूअर में पहुंचे जहां से यह मनुष्य की ओर आए| ऐसा वहां हुआ जहां पर पालतू मुर्गियां और सूअर साथ में पाले जाते थे|

सूअर को इन समझा वायरस के लिए मिक्सिंग वेसन भी कहा जाता है, परंतु एक बार मनुष्य में आ जाने के बाद सूअर का रोल खत्म हो जाता है और यह पूर्ण रूप से मनुष्य का वायरस बन जाता है| अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि बर्ड फ्लू वायरस के आउटब्रेक को इतना महत्व क्यों दिया जाता है|

बर्ड फ्लू वायरस का संक्रमित मुर्गी में लक्षण

यह लक्षण विचित्र रूप से अलग अलग मुर्गियों के फ्लॉक में अलग अलग हो सकता है यह लक्षण वायरस के प्रकार मुर्गी की रोग प्रतिरोधक क्षमता मुर्गी की आयु और दूसरे पर्यावरण के कारकों पर निर्भर करता है|

LAPI वायरस से ग्रसित मुर्गियों में केवल सांस लेने के तंत्र और पेट की बीमारी के लक्षण ही देखते हैं इनमें मुख्य प्रभाव साइनस ट्रेकिया फेफड़े वायु कोष और आंतों में देखने को मिलता है लेयर और ब्रीडर मुर्गियों में बिना किसी लक्षण के अंडों का उत्पादन व्यापक रूप से गिर जाता है|

HAPI वायरस द्वारा ग्रसित मुर्गियां अक्सर कोई लक्षण दिखाने से पहले ही मर जाती हैं, परंतु कुछ अध्ययनों में इन मुर्गियों के फेफड़ों में पानी भर जाता है| जिससे सांस न ले पाने के कारण मुर्गियों की मृत्यु हो जाती है यही कारण होता है, वायरस के प्रकोप से मुर्गियां मिली पड़ जाती हैं| ऐसे हालात में ब्लड प्रेशर बढ़ने से मुर्गियों की कलगी में जख्म दिखाई देते हैं| पाइनस और आंखें सूज जाती हैं अन्य अंदरूनी अंगों में भी व्यापक रूप से घाव में मौजूद होते हैं|


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