इस बीमारी का पता लैब में वायरस को आइसोलेट करके किया जाता है। बाहरी लक्षण से केवल बीमारी की तीव्रता देखी जाती है । जब मुर्गियां मर जाती हैं तब उन्हें लैब में लाया जाता है। बाहरी लक्षण देखने के बाद उन मुर्गियों से वायरस निकालने की प्रक्रिया होती है, जो कि मुर्गियों के एंब्रियो नेटेड अंडू में की जाती है। इस से वायरस निकाल कर विभिन्न मॉलिक्यूलर टेस्ट करके उसका पता लगाया जाता है|
इस वायरस को स्वस्थ मुर्गियों में डालकर देखा जाता है, यदि 75% से अधिक मुर्गियां 10 दिन में मर जाती हैं, तो इस वायरस को HPAI वायरस माना जाता है| इसके बाद इसकी सब टाइपिंग शुरू होती है, जिसमें इस H और N प्रोटीन का पता लगाया जाता है, और फिर इसका नाम निर्धारित होता है|
बर्डफ्लू का उपचार एवं नियंत्रण
इस बीमारी में उपचार के बहुत ज्यादा साधन मौजूद नहीं है, और ना ही कोई व्यक्ति अभी तक बन पाई है, क्योंकि यह समस्या अधिकतर साउथ एशियन देशों की है इसीलिए टीकाकरण पर कोई खास काम नहीं हो रहा है, परंतु विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानव स्वास्थ्य संस्थाएं इस में कार्य कर रही हैं|
आमतौर पर इसमें लक्षणों के आधार पर उपचार किया जाता है, आउटब्रेक के दौरान इम्यून बूस्टर और सेकेंडरी बैक्टीरियल इनफेक्शन से लड़ने के लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं|
फार्म में बायोसिक्योरिटी इस बीमारी से बचाव का सबसे अच्छा और सस्ता आसान उपाय है, लोग अक्सर बायोसिक्योरिटी के सिद्धांतों को नजर अंदाज करते हैं, जिसकी वजह से वह नासिर बर्ड फ्लू बल्कि अन्य बीमारियों से भी नुकसान उठाते हैं|
आसपास के गंदे तालाबों का खास ख्याल रखें, क्योंकि इनमें जंगली पक्षी विचरण करते हैं| इस बीमारी के संवाहक होते हैं, साथ ही अन्य पक्षियों को भी फार्म में ना आने दे और ना ही पालें |
जंगली पक्षियों किसी भी प्रकार से फार्म के पक्षियों के पानी एवं दाने से संपर्क ना होने दें |
पोल्ट्री फार्म के आस पास अगर कोई बाहरी पक्षी मर गया है, तो उसके शरीर को दूर ले जाकर जला दें अथवा जमीन में गाड़ दें ऊपर से नमक और चूना डाल दें, जिस स्थान पर जंगली पक्षी मरा था | उस स्थान की मिट्टी की परत हटाकर डिस्पोज कर दें और उस स्थान को अच्छे से सैनिटाइज कर दें |

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