राजस्थान में जीरे में नियमित छिड़काव व सिंचाई प्रबंधन से होगा रोगों से बचाव

कृषि विज्ञान केंद्र पोकरण में कृषि वैज्ञानिकों ने शहर के निकटवर्ती बिलिया, पोकरण आंचलिक, मालियों का बास इत्यादि क्षेत्रों का भ्रमण करके फसलों का निरीक्षण किया। केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक श्री बलवीर सिंह ने बताया कि किसान जीरा, चना, सरसों, अरंडी, रायडा इत्यादि फसलों से उत्पादन ले रहे हैं। जिनमें उचित मात्रा में खाद, फॉस्फोरस के लिए सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग व उचित दूरी के साथ साथ खरपतवार नियंत्रण की आवश्यकता बताई। उन्नत तकनीकों के प्रयोग द्वारा जीरे की उपज को 25-30 प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है।

केंद्र के सस्य वैज्ञानिक डॉ. के. जी. व्यास ने बताया कि वर्तमान में मौसम में हो रहे परिवर्तन को देखते हुए जीरे में विभिन्न प्रकार के रोग आने की संभावना है। जीरे की फसल में होने वाले एफिड, उकटा, झुलसा व छाछया रोग में लक्षण दिखते ही किसान उपचार करें।  एफिड  नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल. की मात्रा 200 मिलीलीटर या एसीफेट की 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडक़ाव करें। जीरे की फसल में फूल आने के पश्चात बादल होने पर  झुलसा रोग लगता है जिसके कारण पौधों का ऊपरी भाग झुक जाता है तथा पत्तियों व तनों पर भूरे धब्बे बन जाते हैं जिसके प्रबंधन हेतु मेन्कोजेब की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर छिडक़ाव करें। केंद्र के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. राम निवास ने सलाह दी की  खेत में ग्रीष्म ऋतु में जुताई करें एवं एक ही खेत में लगातार जीरे की फसल नहीं उगायें। खेत में उखटा रोग के लक्षण दिखाई देने पर 2.5 किग्रा ट्राईकोडर्मा की 100 किलो कम्पोस्ट के साथ मिलाकर छिडक़ाव करें। जीरे में फसल पकाव पर आने के बाद किसानों को सिंचाई बंद कर दें।

Source: Krishakjagat.org


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2 responses to “राजस्थान में जीरे में नियमित छिड़काव व सिंचाई प्रबंधन से होगा रोगों से बचाव”

  1. Pramod Kumar Avatar
    Pramod Kumar

    Thankyou for Information. This information is very good and useful. 🙏✨

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    Anonymous

    Ganesh

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